Faiz Ahmed Faiz – Dashte Khizaan mein
दश्ते-ख़िज़ाँ में दश्ते-ख़िज़ाँ में जिस दम फैले रुख़्सते-फ़स्ले-गुल की ख़ुशबू सुभ के चश्मे पर जब पहुँचे प्यास का मारा रात
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दश्ते-ख़िज़ाँ में दश्ते-ख़िज़ाँ में जिस दम फैले रुख़्सते-फ़स्ले-गुल की ख़ुशबू सुभ के चश्मे पर जब पहुँचे प्यास का मारा रात
Read Moreगीत- मंज़िलें मंज़िलें फ़िल्म : कसम उस वक़्त की शौके-दीदार की मंज़िलें हुस्ने-दिदार की मंज़िलें, प्यार की मंज़िलें प्यार की
Read Moreपटना जेल की दीवार से मृत्यु-भीत शत-लक्ष मानवों की करुणार्द्र पुकार! ढह पड़ना था तुम्हें अरी ! ओ पत्थर की
Read Moreगीत : पंखी राजा मीठा बोल पंखी राजा रे पंखी राजा मीठा बोल जोत जगी हर मन में भँवरा गूँजा,
Read Moreनव तन कनक-किरण फूटी है नव तन कनक-किरण फूटी है। दुर्जय भय-बाधा छूटी है। प्रात धवल-कलि गात निरामय मधु-मकरन्द-गन्ध विशदाशय,
Read Moreघन तम से आवृत धरणी है घन तम से आवृत धरणी है; तुमुल तरंगों की तरणी है। मन्दिर में बन्दी
Read Moreअवकाश वाली सभ्यता मैं रात के अँधेरे में सिताओं की ओर देखता हूँ जिन की रोशनी भविष्य की ओर जाती
Read Moreशोक की संतान हृदय छोटा हो, तो शोक वहां नहीं समाएगा। और दर्द दस्तक दिये बिना दरवाजे से लौट जाएगा।
Read Moreभगवान के डाकिए पक्षी और बादल, ये भगवान के डाकिए हैं जो एक महादेश से दूसरें महादेश को जाते हैं।
Read Moreक्यों मुझको तुम भूल गये हो क्यों मुझको तुम भूल गये हो? काट डाल क्या, मूल गये हो। रवि की
Read Moreपाप तुम्हारे पांव पड़ा था पाप तुम्हारे पांव पड़ा था, हाथ जोड़कर ठांव खड़ा था। विगत युगों का जंग लगा
Read Moreनव जीवन की बीन बजाई नव जीवन की बीन बजाई। प्रात रागिनी क्षीण बजाई। घर-घर नये-नये मुख, नव कर, भरकर
Read Moreतुम ही हुए रखवाल तुम ही हुए रखवाल तो उसका कौन न होगा? फूली-फली तरु-डाल तो उसका कौन न होगा?
Read Moreमानव का मन शान्त करो हे मानव का मन शान्त करो हे! काम, क्रोध, मद, लोभ दम्भ से जीवन को
Read Moreवे कह जो गये कल आने को वे कह जो गये कल आने को, सखि, बीत गये कितने कल्पों। खग-पांख-मढी
Read Moreतन, मन, धन वारे हैं तन, मन, धन वारे हैं; परम-रमण, पाप-शमन, स्थावर-जंगम-जीवन; उद्दीपन, सन्दीपन, सुनयन रतनारे हैं। उनके वर
Read Moreखुल कर गिरती है खुल कर गिरती है जो, उड़ती फिरती है। ऐसी ही एक बात चलती है, घात खड़ी-खड़ी
Read Moreजमीन दो, जमीन दो सुरम्य शान्ति के लिए, जमीन दो, जमीन दो, महान् क्रान्ति के लिए, जमीन दो, जमीन दो
Read Moreनिर्वासित बार-बार लिपटा चरणों से, बार-बार नीचे आया; चूक न अपनी ज्ञात हमें, है दण्ड कि निर्वासन पाया । (1)
Read Moreआगोचर का आमंत्रण आदि प्रेम की मैं ज्वाला, उतरी गाती यों प्रात-किरण, जो प्रेमी हो, आगे बढ़, मुझ अनल-विशिख का
Read Moreएक भारतीय आत्मा के प्रति (कवि की साठवीं वर्ष गांठ पर) रेशम के डोरे नहीं, तूल के तार नहीं, तुमने
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