Hindi Poetry

Hindi Poetry

Gulzar – Karz

क़र्ज़ इतनी मोहलत कहाँ कि घुटनों से सिर उठाकर फ़लक को देख सको अपने तुकडे उठाओ दाँतो से ज़र्रा-ज़र्रा कुरेदते

Read More