Hindi Poetry

Gulzar – Karz


क़र्ज़

इतनी मोहलत कहाँ कि घुटनों से
सिर उठाकर फ़लक को देख सको
अपने तुकडे उठाओ दाँतो से
ज़र्रा-ज़र्रा कुरेदते जाओ
वक़्त बैठा हुआ है गर्दन पर
तोड़ता जा रहा है टुकड़ों में

ज़िन्दगी देके भी नहीं चुकते
ज़िन्दगी के जो क़र्ज़ देने हों