Hindi Poetry

Faiz Ahmed Faiz – August 1942


अगस्त, १९५२

रौशन कहीं बहार के इमकां हुए तो हैं
गुलशन में चाक चन्द गरेबां हुए तो हैं
अब भी ख़िजां का राज है लेकिन कहीं-कहीं
गोशे चमन-चमन में ग़ज़लख़्वां हुए तो हैं
ठहरी हुयी है शब की सियाही वहीं मगर
कुछ-कुछ सहर के रंग पर अफ़शां हुए तो हैं
उनमें लहू जला हो हमारा कि जानो-दिल
महफ़िल में कुछ चिराग़ फ़रोज़ां हुए तो हैं
हां कज करो कुलाह कि सब-कुछ लुटाके हम
अब बेन्याज़े-गरदिशे-दौरां हुए तो हैं
अहले-कफ़स की सुबहे-चमन में खुलेगी आंख
बादे-सबा के वादा-ओ-पैमां हुए तो हैं
है दशत अब भी दशत मगर ख़ूने-पा से ‘फ़ैज़’
सैराब चन्द ख़ारे-मुग़ीलां हुए तो हैं

(अफ़शां=मशहूर,रौशन, फ़रोज़ां=रौशन,
बेन्याज़े-गरदिशे-दौरां=समय की चाल से
लापरवाह, ख़ारे-मुग़ीलां=कीकर के कंडे)