Hindi Poetry

Faiz Ahmed Faiz – Gaanv ki sadak


गांव की सड़क

ये देस मुख़लिसी-नादार कजकुलाहों का
ये देस बेज़र-ओ-दीनार बादशाहों का
कि जिसकी ख़ाक में कुदरत है कीमीयाई की
ये नायबाने-ख़ुदावन्दे-अरज़ का मसकन
ये नेक पाक बुज़ुर्गों की रूह का मदफ़न
जहां पे चांद सितारों ने जबहासाई की
न जाने कितने ज़मानों से इसका हर रस्ता
मिसाले-ख़ाना-ए-बेख़ानमां था दरबसता
ख़ुशा कि आज बफ़ज़ले-ख़ुदा वो दिन आया
कि दस्त-ए-ग़ैब ने इस घर की दर-कुशाई की
चुने गये हैं सभी ख़ार इसकी राहों से
सुनी गई है बिलआख़िर बरहनापाई की

बेरूत, १९८०

(कजकुलाहों=बाँके, बेज़र-ओ-दीनार=गरीब,
कीमीयाई=कुंदन, नायबाने-ख़ुदावन्दे-अर्ज़=
मुख़त्यार, मसकन=ठिकाना, मदफ़न=कब्र,
जबहासाई=माथा रगड़ना, मिसाले-ख़ाना-ए-
बेख़ानमां=वीरान घर, दरबसता=बंद, ख़ुशा=
वाह वाह, दस्त-ए-ग़ैब=ग़ैबी मदद, कुशाई=
खोलना, बरहनापाई=नंगे पैर)