Hindi Poetry

Faiz Ahmed Faiz – Iqbal


इकबाल

ज़माना था कि हर फ़रद इंतज़ारे-मौत करता था
अमल की आरज़ू बाकी न थी बाज़ू-ए-इनसां में
बिसाते-दहर पर गोया सुकूते-मरग तारी था
सदा-ए-नौहाख़्वां तक भी न थी इस बज़्मे-वीरां में

रगे-मशरिक में ख़ूने-ज़िन्दगी थम-थम के चलता था
ख़िज़ां का रंग था गुलज़ारे-मिल्लत की बहारों में
फ़ज़ा की गोद में चुप थे सितेज़-अंगेज़ हंगामे
शहीदों की सदाएं सो रही थीं कारज़ारों में

सुनी वामन्दा-ए-मंज़िल ने आवाज़े-दार आख़िर
तिरे नग़मों ने तोड़ डाला सिहरे-ख़ामोशी
मये-ग़फ़लत के माते ख़्वाबे-दैरीना से जाग उट्ठे
ख़ुद-आगाही से बदली कलबो-जां की ख़ुदफ़रामोशी

उरूके-मुर्दा मशरिक में ख़ूने-ज़िन्दगी दौड़ा
फ़सुरदा मुश्ते-ख़ाकिसतर से फिर लाखों शरर निकले
ज़मीं से नूर यां ता आसमां परवाज़ करते थे
ये ख़ाकी ज़िन्दातर ता बन्दातर ता इन्दातर निकले

नबूदो-बूद के सब राज़ तूने फिर से बतलाये
हर इक कतरे को वुसअत दे के दरिया कर दिया तूने
हर इक फ़ितरत को तूने उसके इमकानात जतलाये
हर इक ज़ररे को हमदोशो-सुरैया कर दिया तूने

फ़रोग़े-आरज़ू की बसतियां आबाद कर डालीं
जुज़ाने-ज़िन्दगी को आतिशे-दोशीं से भर डाला
तिलिसमे-कुन से तेरा लुकमा-ए-जां-सोज़ क्या कम है
कि तूने सदहज़ार अफ़यून्यों को मर्द कर डाला

(बिसाते-दहर=धरती की सतह, सुकूते-मरग=मौत का
सन्नाटा, नौहाख़्वां=शोक गीत गाने वाला, मशरिक=पूरब,
सितेज़-अंगेज़=जंग से पैदा होने वाले, कारज़ारों=लड़ाईआं,
वामन्दा-ए-मंज़िल=थक कर मंजिल से पीछे रहने वाला,
सिहर=जादू, ख़्वाबे-दैरीना=गहरी नींद, खुद-आगाही=आत्म
ज्ञान, क्लब=दिल, उरूके-मुर्दा=बेजान रगों, फ़सुरदा=उदास,
मुश्ते-ख़ाकिसतर=मुट्ठी भर राख, नबूदो-बूद=है या नहीं,
वुसअत =विस्थार, सुरैया=करितका नक्षत्र, जुज़ाने=भाग,
आतिशे-दोशीं=गुज़री रात की आग, तिलिसमे-कुन=कुन का
चमत्कार, लुकमा-ए-जां-सोज़=दिल जलाने वाला शब्द,
अफ़यून्यों=नशे के मारे लोग)