Faiz Ahmed Faiz – Kahin toh kaarwane dard ki mazil thehar jaaye
कहीं तो कारवाने-दर्द की मंज़िल ठहर जाए
कहीं तो कारवाने-दर्द की मंज़िल ठहर जाये
किनारे आ लगे उमरे-रवां या दिल ठहर जाये
अमौ कैसी कि मौजे-ख़ूं अभी सर से नहीं गुज़री
गुज़र जाये तो शायद बाजुए-कातिल ठहर जाये
कोई दम बादबाने-कशती-ए-सहबा को तह रक्खो
ज़रा ठहरो ग़ुबारे-ख़ातिरे-महफ़िल ठहर जाये
खुमे-साकी में जुज़ ज़हरे-हलाहल कुछ नहीं बाकी
जो हो महफ़िल में इस इकराम के काबिल ठहर जाये
हमारी ख़ामशी बस दिल में लब तक एक वकफ़ा है
य’ तूफ़ां है जो पल-भर बर-लबे-साहिल ठहर जाये
निगाहे-मुंतज़िर कब तक करेगा आईनाबन्दी
कहीं तो दशते-ग़म में यार का महमिल ठहर जाये
(अमौ=शान्ति-सुरक्षा का भाव, बादबाने-कशती-ए-
सहबा=शराब की कशती का बादवान, ग़ुब्बारे-ख़ातिरे-
महफिल=महफिल के दिल का ग़ुब्बार, जुज=सिवा,
इकराम=इज्जत, ख़ामशी=बेबसी, निगाहे-मुंतज़िर=
इन्तज़ार करने वाली नज़र, दशते-ग़म=ग़म का उजाड़,
महमिल=ऊँट पर औरतों के बैठने के लिये बनायी गई
जगह)
सहबा=शराब की कशती का बादवान, ग़ुब्बारे-ख़ातिरे-
महफिल=महफिल के दिल का ग़ुब्बार, जुज=सिवा,
इकराम=इज्जत, ख़ामशी=बेबसी, निगाहे-मुंतज़िर=
इन्तज़ार करने वाली नज़र, दशते-ग़म=ग़म का उजाड़,
महमिल=ऊँट पर औरतों के बैठने के लिये बनायी गई
जगह)