Gulzar – Triveni
1
आओ, सारे पहन लें आईने
सारे देखेंगे अपना ही चेहरा
रूह? अपनी भी किसने देखी है!
क्या पता कब, कहाँ से मारेगी
बस कि मैं ज़िन्दगी से डरता हूँ
मौत का क्या है, एक बार मारेगी
उठते हुए जाते हुए पंछी ने बस इतना ही देखा
देर तक हाथ हिलाती रही वो शाख़ फ़िज़ा में
अलविदा कहने को, या पास बुलाने के लिए?
2
सब पे आती है सब की बारी से
मौत मुंसिफ़ है कम-ओ-बेश नहीं
ज़िन्दगी सब पे क्यूँ नहीं आती
कौन खायेगा किसका हिस्सा है
दाने-दाने पे नाम लिखा है
‘सेठ सूदचंद मूलचंद आक़ा’
उफ़! ये भीगा हुआ अख़बार
पेपर वाले को कल से चेंज करो
‘पांच सौ गाँव बह गए इस साल’