Hindi Poetry

Faiz Ahmed Faiz – Lauho kalam


लौहो-क़लम

हम परवरिशे-लौहो-क़लम करते रहेंगे
जो दिल पे गुज़रती है रक़म करते रहेंगे

असबाबे-ग़मे-इश्क बहम करते रहेंगे
वीरानी-ए-दौराँ पे करम करते रहेंगे

हाँ, तल्ख़ी-ए-अय्याम अभी और बढ़ेगी
हाँ, अह्‍ले-सितम मश्क़े-सितम करते रहेंगे

मंज़ूर यह तल्ख़ी, ये सितम हमको गवारा
दम है तो मदावा-ए-अलम करते रहेंगे

मयख़ानः सलामत है तो हम सुर्ख़ी-ए-मय से
तजईने-दरो-बामे-हरम करते रहेंगे

बाक़ी है लहू दिल में तो हर अश्क से पैदा
रंगे-लबो रुख़सारे-सनम करते रहेंगे

इक तर्ज़े-तग़ाफ़ुल है सो वो उनको मुबारक
इक अर्ज़े-तमन्ना है सो हम करते रहेंगे

(बहम=इकट्ठा, तल्ख़ी-ए-अय्याम=दिनों
की कटुता, मदावा-ए-अलम=दुख का इलाज,
तजईने-दरो-बामे-हरम=मस्जिद के द्वार और
छत की सजावट)