Faiz Ahmed Faiz – Munija ki saalgiraah
मुनीज़ा की सालगिरह
इक मुनीज़ा हमारी बेटी है
जो बहुत ही प्यारी बेटी है
हम ही कब उसको प्यार करते हैं
सब के सब उसको प्यार करते हैं
कैसे सब को न आये प्यार उस पर
है वही तो हमारी डिक्टेटर
प्यार से जो भी जी चुरायेगा
वोह ज़रूर उससे मार खायेगा
ख़ैर येह बात तो हंसी की है
वैसे सचमुच बहुत वोह अच्छी है
फूल की तरह उसकी रंगत है
चांद की तरह उसकी सूरत है
जब वोह ख़ुश हो के मुस्कुराती है
चांदनी जग में फैल जाती है
पढ़ने लिखने में ख़ूब काबिल है
खेलने कूदने में कामिल है
उमर देखो तो आठ साल की है
अक़्ल देखो तो साठ साल की है
फिर वोह गाना भी अच्छा गाती है
गर्चे तुम को नहीं सुनाती है
बात करती है इस कदर मीठी
जैसे डाली पे कूक बुलबुल की
हां कोई उसको जब सताता है
तब ज़रा गुस्सा आ ही जाता है
पर वोह जलदी से मन भी जाती है
कब किसी को भला सताती है
है शिगुफ़ता बहुत मिज़ाज उसका
सारा उमदा है काम काज उसका
है मुनीज़ा की आज सालगिरह
हर तरफ़ शोर है मुबारक का
चांद तारे दुआएं देते हैं
फूल उसकी बलाएं लेते हैं
बाग़ में गा रही है येह बुलबुल
“तुम सलामत रहो मुनीज़ा गुल”
अंमी अब्बा भी और बाजी भी
आंटीयां और बहन भाई भी
आज सब उसको प्यार करते हैं
मिल के सब बार बार करते हैं
फिर यूं ही शोर हो मुबारक का
आए सौ बार तेरी सालगिरह
सौ तो क्या सौ हज़ार बार आये
यूं कहो, बेशुमार बार आये
लाये हर बार अपने साथ ख़ुशी
और हम सब कहा करें यूं ही
येह मुनीज़ा हमारी बेटी है
येह बहुत ही प्यारी बेटी है
सालगिरह =वर्ष-गाँठ, गरचे=
चाहे, शिगुफ़ता मिज़ाज=खुश
स्वभाव)