Hindi Poetry

Faiz Ahmed Faiz – Paris


पेरिस

दिन ढला, कूचा-ओ-बाज़ार में सफ़बसता हुई
ज़र्द-रू रौशनियां
इनमें हर एक के कशकोल से बरसें रिम-झिम
इस भरे शहर की नासूदगीयां
दूर पसमंज़रे-अफ़लाक में धुंधलाने लगे
अज़मते-रफ़ता के निशां
पेश मंज़र में
किसी साया-ए-दीवार से लिपटा हुआ साया कोई
दूसरे साये की मौहूम-सी उम्मीद लिये
ज़ेरे-लब शामे-गुज़िसता की तरह
शरहे-बेदर्दी-ए-अय्याम की तमहीद लिये
और कोई अजनबी
इन रौशनियों के सायों से कतराता हुआ
अपने बेख़्वाब शबिसतां की तरफ़ जाता हुआ

पेरिस, अगसत, १९७९

(सफ़बसता=कतार में ठहरना, कशकोल=कटोरा,
नासूदगीयां=दुख,असंतोष, पसमंज़रे-अफ़लाक=
आकाश की पृष्ट भूमि में, अज़मते-रफ्ता=बीती
शान, पेश मंजर=भूमिका, मौहूम=धुन्दली,
शरहे-बेदर्दी-ए-अय्याम=ज़माने की नीचता पर
टीका टिप्पणी, तमहीद=भूमिका, शबिसतां=
रैण-बसेरा)