Hindi Poetry

Faiz Ahmed Faiz – Sehra


सेहरा

सजायो बज़्म दरे-मयकदा कुशादा करो
उठायो साज़े-तरब, एहतमामे-बादा करो
जलायो चांद सितारे, चिराग़ काफ़ी नहीं
येह शब है जशन की शब रौशनी ज़ियादा करो

सजायो बज़्म कि रंजो-अलम के ज़ख़्म सिले
बिसाते-लुत्फ़ो-मुहब्बत पे आज यार मिले
दुआ को हाथ उठायो कि वक़्ते-नेक आया
रुख़े-अज़ीज़ पे सेहरे के आज फूल खिले
उठायो हाथ कि येह वक़्ते-ख़ुश मुदाम रहे
शबे-निशातो-बिसाते-तरब दवाम रहे
तुम्हारा सहन मुनव्वर हो मिसले-सहने-चमन
और इस चमन में बहारों का इंतज़ाम रहे

(बज़्म=महफिल, कुशादा=खोल दो, तरब=
ख़ुशी, एहतमामे-बादा=जाम का प्रबंध, रंजो-
अलम=दुख-दर्द, बिसाते-लुत्फ़ो-मोहब्बत=
प्यार की सतह पर, मुदाम=हमेशा, शबे-
निशातो-बिसाते-तरब दवाम=ऐश की रात
और ख़ुशी का माहौल हमेशा रहे, सहन=
आंगन, मुनव्वर=रौशन)