Hindi Poetry

Faiz Ahmed Faiz – Sahal yoon raahe zindagi ki hai


सहल यूं राहे-ज़िन्दगी की है

सहल यूं राहे-ज़िन्दगी की है
हर कदम हमने आशिकी की है

हमने दिल में सजा लिये गुलशन
जब बहारों ने बेरुख़ी की है

ज़हर से धो लिये हैं होंठ अपने
लुत्फ़े-साकी ने जब कमी की है

तेरे कूचे में बादशाही की
जब से निकले गदागरी की है

बस वही सुरख़रू हुआ जिसने
बहरे-ख़ूं में शनावरी की है

“जो गुज़रते थे दाग़ पर सदमे”
अब वही कैफ़ीयत सभी की है

(लुत्फ़=आनंद, गदागरी=भिक्षा
माँगना, शनावरी =तैरना)