Hindi Poetry

Faiz Ahmed Faiz – Shaam 2


अब के बरस दस्तूरे-सितम में

अबके बरस दस्तूरे-सितम में क्या-क्या बाब ईज़ाद हुए
जो कातिल थे मकतूल बने, जो सैद थे अब सय्याद हुए

पहले भी ख़िजां में बाग़ उजड़े पर यूं नहीं जैसे अब के बरस
सारे बूटे पत्ता-पत्ता रविश-रविश बरबाद हुए

पहले भी तवाफ़े-शमए-वफ़ा थी, रसम मुहब्बतवालों की
हम-तुम से पहले भी यहां मंसूर हुए, फ़रहाद हुए

इक गुल के मुरझा जाने पर क्या गुलशन में कुहराम मचा
इक चेहरा कुम्हला जाने से कितने दिल नाशाद हुए

‘फ़ैज़’ न हम यूसुफ़ न कोई याकूब जो हमको याद करे
अपना क्या, कनआं में रहे या मिसर में जा आबाद हुए

{ग़नी, रोज़े-सियाहे-पीरे-कनआंरा तमाशाकुन
कि नूरे-दीदा-अश रौशन कुनद चशमे-जुलेख़ा-रा}

(ईज़ाद=खोज, मकतूल=मरने वाला, सैद=शिकार,
सय्याद =शिकारी, तवाफ़े-शमए-वफ़ा=वफ़ा की शमअ
के आसपास चक्कर लगाने वाले, यूसुफ=प्रसिद्ध पैग़म्बर,
याकूब=हज़रत यूसुफ के पिता, कनआं =पच्छमी
एशिया का एक पुराना शहर)