Hindi Poetry

Faiz Ahmed Faiz – Woh buton ne daale hain vasvse ki dilon se khauf ae khuda gya


वो बुतों ने डाले हैं वस्वसे कि दिलों से ख़ौफ़-ए-ख़ुदा गया

वो बुतों ने डाले हैं वस्वसे कि दिलों से ख़ौफ़-ए-ख़ुदा गया
वो पड़ी हैं रोज़ क़यामतें कि ख़्याल-ए-रोज़-ए-जज़ा गया

जो नफ़स था ख़ार-ए-गुलु बना जो उठा तो हाथ क़लम हुये
वो निशात-ए-आहे-सहर गई वो विक़ार-ए-दस्त-ए-दुआ गया

न वो रंग फ़स्ल-ए-बहार का न रविश वो अब्र-ए-बहार की
जिस अदा से यार थे आश्ना वो मिज़ाज-ए-बाद-ए-सबा गया

जो तलब पे अहदे-वफ़ा किया तो वो आबरू-ए-वफ़ा गई
सरे-आम जब हुए मुद्दई तो सवाबे-सिदको-सफ़ा गया

अभी बादबाँ को तह् रखो अभी मुज़तरिब है रुख़-ए-हवा
किसी रास्ते में हैं मुंतज़िर वो सुकूँ जो आके चला गया

(वस्वसे=शंकायें, जज़ा=क्यामत, ख़ार-ए-गुलु=गल का
काँटा, निशात-ए-आहे-सहर=सुबह की फ़रियाद करने का
मज़ा, वकार=सम्मान, मुद्दई=दुश्मन, सवाबे-सिदको-सफ़ा=
पवित्रता और सच्चाई का पुण्य, मुज़तरिब=बेचैन, मुंतज़िर=
इंतज़ार करने वाला)