Faiz Ahmed Faiz – Yeh kis dyaar-e-adam mein
ये किस दयार-ए-अदम में
नहीं है यूं तो नहीं है कि अब नहीं पैदा
किसी के हुस्न में शमशीरे-आफ़ताब का हुस्न
निगाह जिससे मिलायो कि आंख दुखने लगे
किसी अदा में अदा-ए-ख़रामे-बादे-सबा
जिसे ख़्याल में लायो तो दिल सुलगने लगे
किये हैं अब भी अलायो कहीं वो रंगे-बदन
हिजाब था जो किसी तन का पैरहन की तरह
उदास बांहों में खोया हुआ कोई आगोश
कुशादा अब भी है शायद दरे-वतन की तरह
नहीं है यूं तो नहीं है कि अब नहीं बाकी
जहां में बज़्मे-गहे-हुस्नो-इश्क का मेला
बिना-ए-लुतफ़ो-मुहब्बत, रिवाजे-मेहरो-वफ़ा
ये किस दयारे-अदम में मुकीम हैं हम तुम
जहां पे मुजदा-ए-दीदारे-हुस्नो-यार तो क्या
नवैदे-आमदे-रोज़े-जज़ा नहीं आती
ये किस ख़ुमारकदे में नदीम हैं हम तुम
जहां पे शोरिशे-रिन्दाने-मयगुसार तो क्या
शिकसते-शीशा-ए-दिल की सदा नहीं आती
(ना-तमाम)
बेरूत, मारच, १९८१
(दयार-ए-अदम=परलोक, शमशीरे-आफ़ताब=
सूरज की तलवार, अदा-ए-ख़रामे-बादे-सबा=
हवा के चलने की अदा, हिजाब=पर्दा, पैरहन=
कपड़ा, कुशादा=फैला हुआ, बिना=बुनियाद,
ख़ुमारकदे=नशा टूटना, नदीम=दोस्त, शोरिशे –
रिन्दाने-मयगुसार=शराबियों का कोलाहल,
शिकसते-शीशा=प्याला टूटना)
सूरज की तलवार, अदा-ए-ख़रामे-बादे-सबा=
हवा के चलने की अदा, हिजाब=पर्दा, पैरहन=
कपड़ा, कुशादा=फैला हुआ, बिना=बुनियाद,
ख़ुमारकदे=नशा टूटना, नदीम=दोस्त, शोरिशे –
रिन्दाने-मयगुसार=शराबियों का कोलाहल,
शिकसते-शीशा=प्याला टूटना)