Hindi Poetry

Gulzar – Bhmeeri


हम सब भाग रहे थे
रिफ्य़ूजी थे
माँ ने जितने ज़ेवर थे,
सब पहन लिये थे।
बाँध लिये थे….
छोटी मुझसे…. छह सालों की
दूध पिला के,खूब खिलाके
साथ लिया था।
मैने अपनी ऐक “भमीरी”
और ऐक “लाटू”
पजामे मे उड़स लिया था।
रात की रात हम गाँव छोड़कर
भाग रहे थे,रिफ़्यूज़ी थे….
आग धुऐं और चीख पुकार के
जंगल से गुज़रे थे सारे
हम सब के सब घोर धुऐं
मे भाग रहे थे।
हाथ किसी आँधी की आँतें
फाड़ रहे थे
आँखें अपने जबड़े खोले
भौंक रही थीं
माँ ने दौड़ते दौड़ते
ख़ून की कै कर दी थी।
जाने कब छोटी का
मुझसे छूटा हाथ
वहीं छोड़ आया था
अपना बचपन,लेकिन
मैने सरहद के सन्नाटों के
सहराओं मे अक्सर देखा है

एक “भमीरी” अब भी नाचा करती है
और इक “लाटू” अब भी घूमा करता है।
रिफ्य़ूजी ….जीरो लाइन पर