Gulzar – Chaand ghar
कितना अरसा हुआ कोई उम्मीद जलाये,
कितनी मुद्दत हुयी किसी कंदील पे जलती रौशनी रखे ।
चलते फिरते इस सुनसान हवेली में,
तन्हाई से ठोकर खा के,
कितनी बार गिरा हूँ मैं ।
चाँद अगर निकले तो अब इस घर में रौशनी होती है,
वर्ना अँधेरा रहता है!