Hindi Poetry Gulzar – Darakht roz shaam ka buraada bhar ke shakhon mein April 3, 2021 rhymecloud दरख़्त रोज़ शाम का बुरादा भर के शाखों में दरख़्त रोज़ शाम का बुरादा भर के शाखों में पहाड़ी जंगलों के बाहर फेंक आते हैं! मगर वो शाम… फिर से लौट आती है, रात के अन्धेरे में वो दिन उठा के पीठ पर जिसे मैं जंगलों में आरियों से शाख काट के गिरा के आया था!!