Hindi Poetry

Gulzar – Ek parwaaz dikhai di hai


एक परवाज़ दिखाई दी है

एक परवाज़ दिखाई दी है
तेरी आवाज़ सुनाई दी है

सिर्फ़ एक सफ़्हा पलट कर उस ने
सारी बातों की सफ़ाई दी है

फिर वहीं लौट के जाना होगा
यार ने कैसी रिहाई दी है

जिस की आँखों में कटी थीं सदियाँ
उस ने सदियों की जुदाई दी है

ज़िंदगी पर भी कोई ज़ोर नहीं
दिल ने हर चीज़ पराई दी है

आग में क्या क्या जला है शब भर
कितनी ख़ुश-रंग दिखाई दी है