Hindi Poetry

Gulzar – Kaanch ke khwaab


कांच के ख्वाब

देखो आहिस्ता चलो, और भी आहिस्ता ज़रा
देखना, सोच-समझकर ज़रा पाँव रखना
जोर से बज न उठे पैरों की आवाज़ कहीं
कांच के ख़्वाब हैं बिखरे हुए तन्हाई में
ख़्वाब टूटे न कोई, जाग न जायें देखो

जाग जायेगा कोई ख़्वाब तो मर जायेगा