Hindi Poetry

Gulzar – Raat tameer krein


रात तामीर करें

इक रात चलो तामीर करें,
ख़ामोशी के संगे-मरमर पर,
हम तान के तारीकी सर पर,
दो शम’ए जलायें जिस्मों की !

जब ओस, दबे पाँव उतरे
आहट भी ना पाये साँसों की..
कोहरे की रेशमी खुशबू में,
खुशबू की तरह ही लिपटे रहें
और जिस्म के सोंधे पर्दों में
रूहों की तरह लहराते रहें..!!