Hindi Poetry

Gulzar – Sehma sehma dara sa rehta hai


सहमा सहमा डरा सा रहता है

सहमा सहमा डरा सा रहता है
जाने क्यूँ जी भरा सा रहता है

काई सी जम गई है आँखों पर
सारा मंज़र हरा सा रहता है

एक पल देख लूँ तो उठता हूँ
जल गया घर ज़रा सा रहता है

सर में जुम्बिश ख़याल की भी नहीं
ज़ानुओं पर धरा सा रहता है