Hindi Poetry

Gulzar – Sona


सोना

ज़रा आवाज़ का लहजा तो बदलो………
ज़रा मद्धिम करो इस आंच को ‘सोना’
कि जल जाते हैं कंगुरे नर्म रिश्तों के !
ज़रा अलफ़ाज़ के नाख़ुन तराशो ,
बहुत चुभते हैं जब नाराज़गी से बात करती हो !!