Javed Akhtar – Jungle mein ghoomta hai pehron
जंगल में घूमता है पहरों, फ़िकरे-शिकार में दरिन्दा
या अपने ज़ख़्म चाट-ता है, तन्हा कच्छार में दरिन्दा
बातों में दोस्ती का अमृत, सीनो में ज़हर नफ़रातों का,
परबत पे फूल खिल रहे हैं, बैठा है गार में दरिन्दा
ज़हेनी यगानगत के आयेज, थी ख्वाहिशें ख़ज़िल बदन की,
चट्टान पेर बैठा चाँद ताके, जैसे कुँवारों में दरिन्दा
गाँव से सहर आने वाले, आए नदी पे जैसे प्यासे,
था मुंतज़िर उन्ही का कब से, इक रोज़गार में दरिन्दा
मज़हब, ना जंग, ना सियासत, जाने ना जात-पात को भी
अपनी दरिंदगी के आयेज, है किस शूमर में दरिन्दा