Hindi Poetry

Javed Akhtar – Mother Teresa


ए माँ टेरेसा
मुझको तेरी अज़मत से इनकार नहीं है
जाने कितने सूखे लब और वीराँ आँखें
जाने कितने थके बदन और ज़ख़्मी रूहें
कूड़ाघर में रोटी का इक टुकड़ा ढूँढते नंगे बच्चे
फ़ुटपाथों पर गलते सड़ते बुड्ढे कोढ़ी
जाने कितने बेघर बेदर बेकस इनसाँ
जाने कितने टूटे कुचले बेबस इनसाँ
तेरी छाँवों में जीने की हिम्मत पाते हैं
इनको अपने होने की जो सज़ा मिली है
उस होने की सज़ा से
थोड़ी सी ही सही मोहलत पाते हैं
तेरा लम्स मसीहा है
और तेरा करम है एक समंदर
जिसका कोई पार नहीं है
ए माँ टेरेसा
मुझको तेरी अज़मत से इनकार नहीं है

मैं ठहरा ख़ुदगर्ज़
बस इक अपनी ही ख़ातिर जीनेवाला
मैं तुझसे किस मुँह से पूछूँ
तूने कभी ये क्यूँ नहीं पूछा
किसने इन बदहालों को बदहाल किया है
तुने कभी ये क्यूँ नहीं सोचा
कौन-सी ताक़त
इंसानों से जीने का हक़ छीन के
उनको फ़ुटपाथों और कूड़ाघरों तक पहुँचाती है
तूने कभी ये क्यूँ नहीं देखा
वही निज़ामे-ज़र
जिसने इन भूखों से रोटी छीनी है
तिरे कहने पर भूखों के आगे कुछ टुकड़े डाल रहा है
तूने कभी ये क्यूँ नहीं चाहा
नंगे बच्चे बुड्ढे कोढ़ी बेबस इनसाँ
इस दुनिया से अपने जीने का हक़ माँगें
जीने की ख़ैरात न माँगें
ऐसा क्यूँ है
इक जानिब मज़लूम से तुझको हमदर्दी है
दूसरी जानिब ज़ालिम से भी आर नहीं है
लेकिन सच है ऐसी बातें मैं तुझसे किस मुँह से पूछूँ
पूछूँगा तो मुझ पर भी वो ज़िम्मेदारी आ जाएगी
जिससे मैं बचता आया हूँ

बेहतर है ख़ामोश रहूँ मैं
और अगर कुछ कहना हो तो
यही कहूँ मैं
ए माँ टेरेसा
मुझको तेरी अज़मत से इनकार नहीं है

(अज़मत=महानता, बेकस=असहाय,
मोहलत=फुरसत, लम्स=स्पर्श,
निज़ामे-ज़र=अर्थव्यवस्था, जानिब=
तरफ़, मज़लूम=ज़ुल्म सहनेवाला)