Hindi Poetry

Javed Akhtar – Shikast


स्याह के टीले पे तनहा खड़ा वो सुनता है
फ़िज़ा में गूँजती अपनी शिकस्त की आवाज़
निगाह के सामने
मैदान-ए-कारज़ार जहाँ
जियाले ख़्वाबों के पामाल और ज़ख़्मी बदन
पड़े हैं बिखरे हुए चारों सम्त
बेतरतीब
बहुत से मर चुके
और जिनकी साँस चलती है
सिसक रहे हैं
किसी लम्हा मरनेवाले हैं
ये उसके ख़्वाब
ये उसकी सिपाह
उसके जरी
चले थे घर से तो कितनी ज़मीन जीती थी
झुकाए कितने थे मग़रूर बादशाहों के सर
फ़सीलें टूट के गिर के सलाम करती थीं
पहुँचना शर्त थी
थर्राके आप खुलते थे
तमाम क़िलओं के दरवाज़े
सारे महलों के दर
नज़र में उन दिनों मज़र बहुत सजीला था
ज़मीं सुनहरी थी
और आसमान नीला था
मगर थी ख़्वाबों के लश्कर में किसको इतनी ख़बर
हर एक किस्से का इक इख़तिताम होता है
हज़ार लिख दे कोई फ़तह ज़र्रे-ज़र्रे पर
मग़र शिकस्त का भी इक मुक़ाम होता है
उफ़क़ पे चींटियाँ रेंगीं
ग़नीम फ़ौजों ने
वो देखता है
कि ताज़ा कुमक बुलाई है
शिकारी निकले हैं उसके शिकार के ख़ातिर
ज़मीन कहती है
ये नरगा तंग होने को है
हवाएँ कहती हैं
अब वापसी का मौसम है
प वापसी का कहाँ रास्ता बनाया था
जब आ रहा था कहाँ ये ख़याल आया था
पलट के देखता है
सामने समंदर है

किनारे कुछ भी नहीं
सिर्फ़ एक राख का ढेर
ये उसकी कश्ती है
कल उसने ख़ुद जलाई थी

क़रीब आने लगीं क़ातिलों की आवाज़ें
स्याह टीले पे तनहा खड़ा वो सुनता है।