Mirza Ghalib – Aamad ae khat se hua hai sarad jo bazaar ae dost
आमद-ए-ख़त से हुआ है सरद जो बाज़ार-ए-दोसत
दूद-ए-शम-ए-कुशता था शायद ख़त-ए-रुख़सार-ए-दोसत
ऐ दिले-ना-आकबत-अन्देश ज़बत-ए-शौक कर
कौन ला सकता है ताबे-जलवा-ए-दीदार-ए-दोसत
ख़ाना-वीरां-साज़ी-ए-हैरत तमाशा कीजिये
सूरत-ए-नक्शे-कदम हूं रफ़ता-ए-रफ़तार-ए-दोसत
इशक में बेदाद-ए-रशक-ए-ग़ैर ने मारा मुझे
कुशता-ए-दुशमन हूं आख़िर, गरचे था बीमार-ए-दोसत
चशम-ए-मा रौशन कि उस बेदर्द का दिल शाद है
दीदा-ए-पुरख़ूं हमारा साग़र-ए-सरशार-ए-दोसत
ग़ैर यूं करता है मेरी पुरसिश उस के हिज़्र में
बे-तकल्लुफ़ दोसत हो जैसे कोई ग़मख़वार-ए-दोसत
ताकि मैं जानूं कि है उस की रसायी वां तलक
मुझ को देता है पयाम-ए-वादा-ए-दीदार-ए-दोसत
जबकि में करता हूं अपना शिकवा-ए-ज़ोफ़-ए-दिमाग़
सर करे है वह हदीस-ए-ज़ुल्फ़-ए-अम्बरबार-ए-दोसत
चुपके-चुपके मुझ को रोते देख पाता है अगर
हंस के करता है बयाने-शोख़ी-ए-गुफ़तारे-दोसत
मेहरबानी हाए-दुशमन की शिकायत कीजिये
या बयां कीजे, सिपासे-लज़ज़ते-आज़ारे-दोसत
यह ग़ज़ल अपनी मुझे जी से पसन्द आती है आप
है रदीफ़-ए-शेर में ”ग़ालिब” ज़बस तकरार-ए-दोसत