Hindi Poetry

Mirza Ghalib – Ajab nishant se jallaad ki chale hain hum aage


अजब निशात से जल्लाद के चले हैं हम आगे
कि अपने साए से सर पांव से है दो कदम आगे

कज़ा ने था मुझे चाहा ख़राब-ए-बादा-ए-उलफ़त
फ़कत ”ख़राब” लिखा बस, न चल सका कलम आगे

ग़म-ए-ज़माना ने झाड़ी निशात-ए-इशक की मसती
वगरना हम भी उठाते थे लज़्ज़त-ए-अलम आगे

ख़ुदा के वासते दाद उस जुनून-ए-शौक की देना
कि उस के दर पे पहुंचते हैं नामा-बर से हम आगे

यह उम्र भर जो परेशानियां उठायी हैं हम ने
तुम्हारे आइयो ऐ तुर्रह-हा-ए-ख़म-ब-ख़म आगे

दिल-ओ-जिगर में पुर-अफ़शा जो एक मौज-ए-ख़ूं है
हम अपने ज़ोअम में समझे हुए थे उस को दम आगे

कसम जनाज़े पे आने की मेरे खाते हैं ”ग़ालिब”
हमेशा खाते थे जो मेरी जान की कसम आगे