Hindi Poetry

Mirza Ghalib – Ishrat ae katra hai dariya mein fanaa ho jaana


इशरत-ए-कतरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना

तुझसे किस्मत में मेरी सूरत-ए-कुफ़ल-ए-अबजद
था लिखा बात के बनते ही जुदा हो जाना

दिल हुआ कशमकशे-चारा-ए-ज़हमत में तमाम
मिट गया घिसने में इस उकदे का वा हो जाना

6 अब ज़फ़ा से भी हैं महरूम हम, अल्लाह-अल्लाह!
इस कदर दुशमन-ए-अरबाब-ए-वफ़ा हो जाना

ज़ोफ़ से गिरियां मुबद्दल ब-दमे-सरद हुआ
बावर आया हमें पानी का हवा हो जाना

दिल से मिटना तेरी अंगुशते-हनायी का ख़याल
हो गया गोशत से नाख़ुन का जुदा हो जाना

है मुझे अब्र-ए-बहारी का बरस कर खुलना
रोते-रोते ग़म-ए-फ़ुरकत में फ़ना हो जाना

गर नहीं निकहत-ए-गुल को तेरे कूचे की हवस
कयों है गरद-ए-रह-ए-जौलाने-सबा हो जाना

ताकि मुझ पर खुले ऐजाज़े-हवाए-सैकल
देख बरसात में सबज़ आईने का हो जाना

बखशे है जलवा-ए-गुल ज़ौक-ए-तमाशा, ‘गालिब’
चशम को चाहिये हर रंग में वा हो जाना