Mirza Ghalib – Dil he toh hai na sang-o-khisht
दिल ही तो है न संग-ओ-ख़िशत दर्द से भर न आये कयों
रोएंगे हम हज़ार बार कोई हमें सताये कयों
दैर नहीं, हरम नहीं, दर नहीं, आसतां नहीं
बैठे हैं रहगुज़र पे हम, ग़ैर हमें उठाये कयों
जब वो जमाल-ए-दिलफ़रोज़, सूरते-मेह्रे-नीमरोज़
आप ही हो नज़ारा-सोज़, परदे में मुंह छिपाये कयों
दशना-ए-ग़मज़ा जां-सतां, नावक-ए-नाज़ बे-पनाह
तेरा ही अकस-ए-रुख़ सही, सामने तेरे आये कयों
कैदे-हयातो-बन्दे-ग़म असल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी ग़म से निजात पाये कयों
हुसन और उसपे हुसन-ए-ज़न रह गई बुल-हवस की शरम
अपने पे एतमाद है ग़ैर को आज़माये कयों
वां वो ग़ुरूर-ए-इज़ज़-ओ-नाज़ यां ये हिजाब-ए-पास-ए-वज़अ
राह में हम मिलें कहां, बज़म में वो बुलाये कयों
हां वो नहीं ख़ुदापरसत, जायो वो बेवफ़ा सही
जिसको हो दीन-ओ-दिल अज़ीज़, उसकी गली में जाये कयों
‘ग़ालिब’-ए-ख़सता के बग़ैर कौन से काम बन्द हैं
रोइये ज़ार-ज़ार क्या, कीजिये हाय-हाय कयों