Mirza Ghalib – Jahan tere nakshe kadam dekhte hain
जहां तेरा नक्शे-कदम देखते हैं
ख़ियाबां ख़ियाबां इरम देखते हैं
दिल आशुफ़तगा खाले-कुंजे-दहन के
सुवैदा में सैरे-अदम देखते हैं
तिरे सरवे-कामत से, इक कद्दे-आदम
कयामत के फितने को कम देखते हैं
तमाशा कर ऐ महवे-आईनादारी
तुझे किस तमन्ना से हम देखते हैं
सुराग़े-तुफ़े-नाला ले दाग़े-दिल से
कि शब-रौ का नक्शे-कदम देखते हैं
बना कर फ़कीरों का हम भेस, ‘गालिब’
तमाशा-ए-अहले-करम देखते हैं