Hindi Poetry

Mirza Ghalib – Ki wafa humse toh gaur usko jafa kehte hain


की वफ़ा हमसे तो ग़ैर उसको जफ़ा कहते हैं
होती आई है कि अच्छों को बुरा कहते हैं

आज हम अपनी परेशानी-ए-ख़ातिर उनसे
कहने जाते तो हैं, पर देखीए क्या कहते हैं

अगले वकतों के हैं ये लोग इनहें कुछ न कहो
जो मै-ओ-नग़मा को अन्दोहरुबा कहते हैं

दिल में आ जाये है होती है जो फ़ुरसत ग़म से
और फिर कौन से नाले को रसा कहते हैं

है परे सरहदे-इदराक से अपना मसजूद
किबले को अहले-नज़र किबला नुमा कहते हैं

पाए-अफ़गार पे जब तुझे रहम आया है
खारे-रह को तेरे हम मेहर गिया कहते हैं

इक शरर दिल में है उससे कोई घबराएगा क्या
आग मतलूब है हमको जो हवा कहते हैं

देखीए लाती है उस शोख़ की नख़वत क्या रंग
उसकी हर बात पे हम नामे-ख़ुदा कहते हैं

वहशत-ओ-शेफ़ता अब मरसीया कहवें शायद
मर गया ग़ालिब-ए-आसुफ़ता-नवा कहते हैं