Mirza Ghalib – Laazim tha ki dekho mera rasta koi din aur
लाज़िम था कि देखो मेरा रसता कोई दिन और
तनहा गये कयों ? अब रहो तनहा कोई दिन और
मिट जायेगा सर, गर तेरा पत्थर न घिसेगा
हूं दर पे तेरे नासिया-फ़रसा कोई दिन और
आये हो कल और आज ही कहते हो कि जाऊं
माना कि हमेशा नहीं, अच्छा, कोई दिन और
जाते हुए कहते हो, क्यामत को मिलेंगे
क्या ख़ूब! क्यामत का है गोया कोई दिन और
हां ऐ फ़लक-ए-पीर, जवां था अभी आरिफ़
क्या तेरा बिगड़ता जो न मरता कोई दिन और
तुम माह-ए-शब-ए-चार-दहुम थे मेरे घर के
फिर कयों न रहा घर का वो नक्शा कोई दिन और
तुम कौन से ऐसे थे खरे दाद-ओ-सितद के
करता मलक-उल-मौत तकाज़ा कोई दिन और
मुझसे तुम्हें नफ़रत सही, नय्यर से लड़ाई
बच्चों का भी देखा न तमाशा कोई दिन और
ग़ुज़री न बहर-हाल ये मुद्दत ख़ुश-ओ-नाख़ुश
करना था, जवां-मरग! गुज़ारा कोई दिन और
नादां हो जो कहते हो कि कयों जीते हो ”ग़ालिब”
किस्मत में है मरने की तमन्ना कोई दिन और