Hindi Poetry

Mirza Ghalib – Uss bazm mein mujhe nahi banti hyaa kiye


उस बज़म में मुझे नहीं बनती हया किये
बैठा रहा अगरचे इशारे हुआ किये

दिल ही तो है सियासत-ए-दरबां से डर गया
मैं और जाऊं दर से तेरे बिन सदा किये

रखता फिरूं हूं ख़िरका-ओ-सज्जादा रहन-ए-मय
मुद्दत हुयी है दावत-ए-आब-ओ-हवा किये

बेसरफ़ा ही गुज़रती है, हो गरचे उम्र-ए-ख़िज़्र
हज़रत भी कल कहेंगे कि हम क्या किया किये

मकदूर हो तो ख़ाक से पूछूं के ऐ लईम
तूने वो गंजहा-ए-गिरां-माया क्या किये

किस रोज़ तोहमतें न तराशा किये अदू
किस दिन हमारे सर पे न आरे चला किये

सोहबत में ग़ैर की न पड़ी हो कहीं ये ख़ू
देने लगा है बोसे बग़ैर इलतिजा किये

ज़िद की है और बात मगर ख़ू बुरी नहीं
भूले से उस ने सैकड़ों वादे-वफ़ा किये

‘ग़ालिब’ तुम्हीं कहो कि मिलेगा जवाब क्या
माना कि तुम कहा किये और वो सुना किये