Hindi Poetry

Ramdhari Singh Dinkar – Aasha ki vanshi


 आशा की वंशी

लिख रहे गीत इस अंधकार में भी तुम
रवि से काले बरछे जब बरस रहे हैं,
सरिताएँ जम कर बर्फ हुई जाती हैं,
जब बहुत लोग पानी को तरस रहे हैं?

इन गीतों से यह तिमिर-जाल टूटेगा?
यह जमी हुई सरिता फिर धार धरेगी?
बरसेगा शीतल मेघ? लोग भीगेंगे?
यह मरी हुई हरियाली नहीं मरेगी?

तो लिखो, और मुझ में भी जो आशा है,
उसको अपने गीतों में कहीं सजा दो।
ज्योतियाँ अभी इसके भीतर बाकी हैं,
लो, अंधकार में यह बाँसुरी बजा दो।

(१९५४ ई०)