Hindi Poetry

Ramdhari Singh Dinkar – Bhiayo aur behno


भाइयो और बहनो

लो शोणित, कुछ नहीं अगर
यह आंसू और पसीना!
सपने ही जब धधक उठें
तब धरती पर क्या जीना?
सुखी रहो, दे सका नहीं मैं
जो-कुछ रो-समझाकर,
मिले कभी वह तुम्हें भाइयो-
बहनों! मुझे गंवाकर!