Hindi Poetry

Ramdhari Singh Dinkar – Vyashisht


व्यष्टि

तुम जो कहते हो, हम भी हैं चाहते वही,
हम दोनों की किस्मत है एक दहाने में,
है फर्क मगर, काशी में जब वर्षा होती,
हम नहीं तानते हैं छाते बरसाने में ।

तुम कहते हो, आदमी नहीं यों मानेगा,
खूंटे से बांधो इसे और रिरियाने दो;
सीधे मन से जो पाठ नहीं यह सीख सका,
लाठी से थोड़ी देर हमें सिखलाने दो ।

हम कहते हैं, आदमी तभी सीधा होगा,
जब ऊँचाई पर पहुँच स्वयं वह जागेगा,
यों, सदी दो सदी तक खूंटे से बाँध रखो,
जंजीरें ढीली हुईं कि वह फिर भागेगा ।

है आँख तुम्हारी निराकारता’ के ऊपर,
तुम देख रहे कल्पित समाज की छाया को;
हमको तो केवल व्यष्टि दिखायी पड़ती है,
मूटूठी कैसे पकडे समष्टि की माया को ?

मढ़ कभी सकोगे चाम निखिल भूमंडल पर ?
बेकार रात-दिन इतना स्वेद बहाते हो ।
कांटे पथ में हैं अगर, व्यक्ति के पाँवों में,
तुम अलग-अलग जूते क्यों नहीं पिन्हाते हो ?

(1950 ई०)