Javed Akhtar – Doraha
(अपनी बेटी ज़ोया के नाम) ये जीवन इक राह नहीं इक दोराहा है पहला रस्ता बहुत सरल है इसमें कोई
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Javed Akhtar (born 17 January 1945) is an Indian political activist, poet, lyricist, and screenwriter, originally from Gwalior area. He is a recipient of the Padma Shri (1999), Padma Bhushan (2007),[1] the Sahitya Akademi Award as well as five National Film Awards. In the early part of his career, he was a screenplay writer, creating movies like Deewar, Janzeer, and Sholay. Later he left screenplay writing and became a lyricist.
(अपनी बेटी ज़ोया के नाम) ये जीवन इक राह नहीं इक दोराहा है पहला रस्ता बहुत सरल है इसमें कोई
Read Moreमुझको यक़ीं है सच कहती थीं जो भी अम्मी कहती थीं जब मेरे बचपन के दिन थे चाँद में परियाँ
Read Moreमेरे दिल में उतर गया सूरज तीरगी में निखर गया सूरज दर्स देकर हमें उजाले का खुद अँधेरे के घर
Read Moreये वक़्त क्या है? ये क्या है आख़िर कि जो मुसलसल गुज़र रहा है ये जब न गुज़रा था, तब
Read Moreदर्द के फूल भी खिलते हैं बिखर जाते हैं ज़ख़्म कैसे भी हों कुछ रोज़ में भर जाते हैं रास्ता
Read Moreग़म बिकते हैं बाजारों में ग़म काफी महंगे बिकते हैं लहजे की दूकान अगर चल जाये तो जज्बे के गाहक
Read Moreफिरते हैं कब से दर-ब-दर अब इस नगर अब उस नगर इक दूसरे के हम-सफ़र मैं और मिरी आवारगी ना-आश्ना
Read Moreएक पत्थर की अधूरी मूरत चंद तांबें के पुराने सिक्के काली चांदी के अजब जेवर और कई कांसे के टूटे
Read Moreमैं भूल जाऊँ तुम्हें अब यही मुनासिब है मगर भुलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूँ कि तुम तो फिर
Read Moreआओ और ना सोचो सोच के क्या पाओगे जितना भी समझे हो उतना पछताए हो जितना भी समझोगे उतना पछताओगे
Read Moreज़रा मौसम तो बदला है मगर पेड़ों की शाख़ों पर नए पत्तों के आने में अभी कुछ दिन लगेंगे बहुत
Read Moreजिस्म दमकता, ज़ुल्फ़ घनेरी, रंगीं लब, आँखें जादू संग-ए-मरमर, ऊदा बादल, सुर्ख़ शफ़क़, हैराँ आहू भिक्षु-दानी, प्यासा पानी, दरिया सागर,
Read Moreकोई शेर कहूँ या दुनिया के किसी मोजुं पर में कोई नया मजमून पढूं या कोई अनोखी बात सुनूँ कोई
Read Moreशहर के दुकाँदारो, कारोबार-ए-उलफ़त में सूद क्या ज़ियाँ क्या है, तुम न जान पाओगे दिल के दाम कितने हैं, ख़्वाब
Read Moreसच ये है बेकार हमें ग़म होता है जो चाहा था दुनिया में कम होता है ढलता सूरज फैला जंगल
Read Moreस्याह के टीले पे तनहा खड़ा वो सुनता है फ़िज़ा में गूँजती अपनी शिकस्त की आवाज़ निगाह के सामने मैदान-ए-कारज़ार
Read Moreमैं ख़ुद भी सोचता हूँ ये क्या मेरा हाल है जिस का जवाब चाहिए वो क्या सवाल है घर से
Read Moreशाम होने को है लाल सूरज समंदर में खोने को है और उसके परे कुछ परिन्दे क़तारें बनाए उन्हीं जंगलों
Read Moreमै पा सका न कभी इस खलीस से छुटकारा वो मुझसे जीत भी सकता था जाने क्यों हारा बरस के
Read Moreये तसल्ली है कि हैं नाशाद सब मैं अकेला ही नहीं बरबाद सब सब की ख़ातिर हैं यहाँ सब अजनबी
Read Moreदर्द बेरहम है जल्लाद है दर्द दर्द कुछ कहता नहीं सुनता नहीं दर्द बस होता है दर्द का मारा हुआ
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