Ramdhari Singh Dinkar – निर्झरिणी
निर्झरिणी मधु-यामिनी-अंचल-ओट में सोई थी बालिका-जूही उमंग-भरी; विधु-रंजित ओस-कणों से भरी थी बिछी वन-स्वप्न-सी दूब हरी; मृदु चाँदनी-बीच थी खेल
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निर्झरिणी मधु-यामिनी-अंचल-ओट में सोई थी बालिका-जूही उमंग-भरी; विधु-रंजित ओस-कणों से भरी थी बिछी वन-स्वप्न-सी दूब हरी; मृदु चाँदनी-बीच थी खेल
Read Moreमिथिला मैं पतझड़ की कोयल उदास, बिखरे वैभव की रानी हूँ मैं हरी-भरी हिम-शैल-तटी की विस्मृत स्वप्न-कहानी हूँ। अपनी माँ
Read Moreपटना जेल की दीवार से मृत्यु-भीत शत-लक्ष मानवों की करुणार्द्र पुकार! ढह पड़ना था तुम्हें अरी ! ओ पत्थर की
Read Moreबोधिसत्त्व सिमट विश्व-वेदना निखिल बज उठी करुण अन्तर में, देव ! हुंकरित हुआ कठिन युगधर्म तुम्हारे स्वर में । काँटों
Read Moreओ द्विधाग्रस्त शार्दूल ! बोल हिल रहा धरा का शीर्ण मूल, जल रहा दीप्त सारा खगोल, तू सोच रहा क्या
Read Moreतांडव नाचो, हे नाचो, नटवर ! चन्द्रचूड़ ! त्रिनयन ! गंगाधर ! आदि-प्रलय ! अवढर ! शंकर! नाचो, हे नाचो,
Read Moreबागी (बोरस्टल जेल के शहीद यतीन्द्रनाथ दास की मृत्यु पर) निर्मम नाता तोड़ जगत का अमरपुरी की ओर चले, बन्धन-मुक्ति
Read Moreव्योम-कुंजों की परी अयि कल्पने व्योम-कुंजों की परी अयि कल्पने व्योम-कुंजों की परी अयि कल्पने ! भूमि को निज स्वर्ग
Read Moreकस्मै देवाय ? रच फूलों के गीत मनोहर. चित्रित कर लहरों के कम्पन, कविते ! तेरी विभव-पुरी में स्वर्गिक स्वप्न
Read Moreपाटलिपुत्र की गंगा से संध्या की इस मलिन सेज पर गंगे ! किस विषाद के संग, सिसक-सिसक कर सुला रही
Read Moreमंगल-आह्वान भावों के आवेग प्रबल मचा रहे उर में हलचल। कहते, उर के बाँध तोड़ स्वर-स्त्रोत्तों में बह-बह अनजान, तृण,
Read Moreस्वर्ण घन उठो, क्षितिज-तट छोड़ गगन में कनक-वरण घन हे! बरसो, बरसो, भरें रंग से निखिल प्राण-मन हे! भींगे भुवन
Read Moreअमा-संध्या नीरव, प्रशान्त जग, तिमिर गहन। रुनझुन रुनझुन किसका शिंजन? किसकी किंकिणि-ध्वनि? मौन विश्व में झनक उठा किसका कंकण? झिल्ली-स्वन?
Read Moreविश्व-छवि मैं तुझे रोकता हूँ पल-पल, तू और खिंचा-सा जाता है, मन, जिसे समझता तू सुन्दर, उस जग से कब
Read Moreपावस-गीत अम्बर के गृह गान रे, घन-पाहुन आये। इन्द्रधनुष मेचक-रुचि-हारी, पीत वर्ण दामिनि-द्युति न्यारी, प्रिय की छवि पहचान रे, नीलम
Read Moreपरियों का गीत-1 हम गीतों के प्राण सघन, छूम छनन छन, छूम छनन । बजा व्योम वीणा के तार, भरती
Read Moreरहस्य तुम समझोगे बात हमारी? उडु-पुंजों के कुंज सघन में, भूल गया मैं पन्थ गगन में, जगे-जगे, आकुल पलकों में
Read Moreपरियों का गीत-2 फूलों की नाव बहाओ री,यह रात रुपहली आई । फूटी सुधा-सलिल की धारा डूबा नभ का कूल
Read Moreसंबल सोच रहा, कुछ गा न रहा मैं। निज सागर को थाह रहा हूँ, खोज गीत में राह रहा हूँ,
Read Moreवर्षा-गान दूर देश के अतिथि व्योम में छाए घन काले सजनी, अंग-अंग पुलकित वसुधा के शीतल, हरियाले सजनी! भींग रहीं
Read Moreप्रतीक्षा अयि संगिनी सुनसान की! मन में मिलन की आस है, दृग में दरस की प्यास है, पर, ढूँढ़ता फिरता
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