Hindi Poetry

Faiz Ahmed Faiz – Hairaan hai jabi aaj kidhar sajda rawan hai


हैराँ हैं जबीं आज किधर सज्दा रवाँ है

हैरां है जबीं आज किधर सजदा रवां है
सर पर हैं खुदावन्द, सरे-अर्श ख़ुदा है

कब तक इसे सींचोगे तमन्नाए-समर में
यह सबर का पौधा तो न फूला न फला है

मिलता है ख़िराज इसको तिरी नाने-जवीं से
हर बादशाहे-वक़्त तिरे दर का गदा है

हर-एक उकूबत से है तलख़ी में सवातर
वो रंज, जो-नाकरदा गुनाहों की सज़ा है

एहसान लिये कितने मसीहा-नफ़सों के
क्या कीजीये दिल का न जला है, न बुझा है

(जबीं=माथा, खुदावन्द=मालिक, तमन्नाए-समर=
फल की उम्मीद में, नाने-जवीं=ज्वार की रोटी,
उकूबत=तसीहा, सवातर=ज़्यादा, मसीहा-नफ़सों =
मसीहे की तरह नई ज़िंदगी देने वाले लोग)