Faiz Ahmed Faiz – Gham ba dil , shukar ba labb, masto-gazalkhcha chaliye
ग़म-ब-दिल, शुक्र-ब-लब, मस्तो-ग़ज़लख़्वाँ चलिए
ग़म-ब-दिल, शुक्र-ब-लब, मस्तो-ग़ज़लख़्वाँ चलिए
जब तलक साथ तेरे उम्रे-गुरेज़ां चलिए
रहमते-हक से जो इस सम्त कभी राह निकले
सू-ए-जन्नत भी बराहे-रहे-जानां चलिए
नज़र मांगे जो गुलसितां से ख़ुदावन्दे-जहां
सागरो-ख़ुम में लिये ख़ूने-बहारां चलिए
जब सताने लगे बेरंगी-ए-दीवारे-जहां
नक़्श करने कोई तस्वीरे-हसीनां चलिए
कुछ भी हो आईना-ए-दिल को मुसफ़्फ़ा रखीए
जो भी ग़ुजरे, मिसले-खुसरवे-ए-दौरां चलिए
इमतहां जब भी हो मंज़ूर जिगरदारों का
महफ़िले-यार में हमराहे-रकीबां चलिए
(ब=में,पर, ग़ज़लख़्वाँ=ग़ज़ल गाते हुए,
उम्रे-गुरेज़ां=बचकर रहने वाली उम्र, हक=
ख़ुदा, बराहे-रहे-जानां=प्यारे का रास्ता,
मुसफ़्फ़ा=पवित्र किया हुआ)