Faiz Ahmed Faiz – Fir aiyana-e-aalam shayad ki nikhar jaaye
फिर आईना-ए-आलम शायद कि निखर जाये
फिर आईना-ए-आलम शायद कि निखर जाये
फिर अपनी नज़र शायद ताहद्दे-नज़र जाये
सहरा पे लगे पहरे और कुफ़ल पड़े बन पर
अब शहर-बदर होकर दीवाना किधर जाये
ख़ाके-रहे-जानां पर कुछ ख़ूं था गिरा अपना
इस फ़सल में मुमकिन है ये कर्ज़ उतर जाये
देख आयें चलो हम भी जिस बज़्म में सुनते हैं
जो ख़ुन्दा-ब-लब आये वो ख़ाक ब-सर जाये
या ख़ौफ़ से दर गुज़रें या जां से गुज़र जायें
मरना है कि जीना है इक बात ठहर जाये
(आलम=संसार, ताहद्दे-नज़र=नज़र की हद
तक, सहरा=रेगस्तान, कुफ़ल=ताला)
तक, सहरा=रेगस्तान, कुफ़ल=ताला)