Faiz Ahmed Faiz – Qawalli
कव्वाली
जला फिर सबर का ख़िरमन, फिर आहों का धुआं उट्ठा
हुआ फिर नज़रे-सरसर हर नशेमन का हर इक तिनका
हुई फिर सुबहे-मातम आसुयों से भर गये दरिया
चला फिर सू-ए-गर्दूं कारवाने-नाला-ए-शब हा
हर इक जानिब फ़ज़ा में फिर मचा कुहरामे-या-रब-हा
उमड़ आई कहीं से फिर घटा वहशी ज़मानों की
फ़ज़ा में बिजलियां लहराईं फिर से ताज़यानों की
कल्म होने लगी गर्दन कल्म के पासबानों की
खुला नीलाम ज़हनों का, लगी बोली ज़बानों की
लहू देने लगा हर इक दहन में बख़ीया-ए-लब हा
चला फिर सू-ए-गर्दूं कारवाने-नाला-ए-शब हा
सितम की आग का ईंधन बने दिल फिर से, वा दिल हा
ये तेरे सादा दिल बन्दे किधर जायें ख़ुदावन्दा
बना फिरता है हर इक मुद्दई पैगाम्बर तेरा
हर इक बुत को सनमख़ाने में दावा है ख़ुदाई का
ख़ुदा महफ़ूज रक्खे अज़ ख़ुदावन्दाने-मज़हब हा
चला फिर सू-ए-गर्दूं कारवाने-नाला-ए-शब हा
बेरूत, १९७९
सू-ए-गर्दूं=आकाश की तरफ, कारवाने-नाला-ए-शब=
रात की फ़रियादों के काफिले, पासबानों=रक्षक, दहन=मुँह,
सनमख़ाने=बुतखाने, ख़ुदावन्दाने-मजहब =धर्म के ठेकेदार)