Hindi Poetry

Faiz Ahmed Faiz – Aarzoo


आरज़ू

मुझे मोजज़ों पे यकीं नहीं मगर आरज़ू है कि जब कज़ा
मुझे बज़्मे-दहर से ले चले
तो फिर एक बार ये अज़न दे
कि लहद से लौट के आ सकूं
तिरे दर पे आ के सदा करूं
तुझे ग़म-गुसार की हो तलब तो तिरे हुज़ूर में जा रहूं
ये न हो तो सूए-रहे-अदम में फिर एक बार रवाना हूं

(मोजज़ों=करामातों, कज़ा=मौत, दहर=दुनिया, अज़न=
इजाज़त, लहद=कब्र, सूए-रहे-अदम=परलोक के रास्ते पर)