Hindi Poetry

Faiz Ahmed Faiz – Major Ishaaq ki yaad mein


मेजर इसहाक की याद में

लो तुम भी गये हमने तो समझा था कि तुमने
बांधा था कोई यारों से पैमाने-वफ़ा और
ये अहद कि ताउमरे-रवां साथ रहोगे
रसते में बिछड़ जायेंगे जब अहले-सफ़ा और
हम समझे थे सैयाद का तरकश हुआ ख़ाली
बाकी था मगर उसमें अभी तीरे-कज़ा और
हर ख़ार रहे-दश्त का है सवाली
कब देखिये आता है आबला-पा और
आने में तअम्मुल था अगर रोज़े-जज़ा को
अच्छा था ठहर जाते अगर तुम भी ज़रा और

बेरूत, ३ जून, १९८२