Faiz Ahmed Faiz – Darbaar mein ab satvate-shaahi ki alaamat
दरबार में अब सतवते-शाही की अलामत
दरबार में अब सत्वते-शाही की अलामत
दरबां का असा है कि मुसन्निफ़ की कलम है
आवारा है जो फिर कोहे-निदा पर जो बशारत
तमहीदे-मसर्रत है कि तूले-शबे-ग़म है
जिस धज्जी को गलियों में लिये फिरते हैं तिफ़लां
ये मेरा ग़रेबां है कि लशकर का अलम है
जिस अक्स से है शहर की दीवार दरख़्शां
ये ख़ूने शहीदां है कि ज़रख़ाना-ए-जम है
हलका किये बैठे रहो इक शमआ को यारो
कुछ रौशनी बाकी तो है हरचन्द कि कम है
(सत्वते-शाही की अलामत=राजसी ठाठबाठ
का चिह्न, असा=डंडा, मुसन्निफ़=लेखक,
कोहे-निदा=एक पहाड़ जिस में से भेद भरीं
आवाज़ें आती थीं ,बशारत=शुभ सूचना,
तमहीदे-मसर्रत=ख़ुशी की भूमिका,तूल=
फैलाव, तिफ़लां=बच्चे, दरख़्शां=चमकती,
ज़रख़ाना-ए-जम=बादशाह जमशेद का
ख़ज़ाना, हलका किये=घेरकर)
का चिह्न, असा=डंडा, मुसन्निफ़=लेखक,
कोहे-निदा=एक पहाड़ जिस में से भेद भरीं
आवाज़ें आती थीं ,बशारत=शुभ सूचना,
तमहीदे-मसर्रत=ख़ुशी की भूमिका,तूल=
फैलाव, तिफ़लां=बच्चे, दरख़्शां=चमकती,
ज़रख़ाना-ए-जम=बादशाह जमशेद का
ख़ज़ाना, हलका किये=घेरकर)