Hindi Poetry

Faiz Ahmed Faiz – Hum musafir yoon hi mashroofe safar jaayenge


 हम मुसाफ़िर यूँ ही मसरूफ़े सफ़र जाएँगे

हम मुसाफ़िर यूँ ही मसरूफ़े सफ़र जाएँगे
बेनिशाँ हो गए जब शहर तो घर जाएँगे

किस क़दर होगा यहाँ मेहर-ओ-वफ़ा का मातम
हम तेरी याद से जिस रोज़ उतर जाएँगे

जौहरी बंद किए जाते हैं बाज़ारे-सुख़न
हम किसे बेचने अलमास-ओ-गुहर जाएँगे

नेमते-ज़ीसत का ये करज़ चुकेगा कैसे
लाख घबरा के ये कहते रहें मर जायेंगे

शायद अपना ही कोई बैत हुदी-ख़्वाँ बन कर
साथ जाएगा मेरे यार जिधर जाएँगे

‘फ़ैज़’ आते हैं रहे-इश्क़ में जो सख़्त मक़ाम
आने वालों से कहो हम तो गुज़र जाएँगे

(अलमासो-गुहर=हीरे-मोती, नेमते-ज़ीसत=
जीवन का वरदान, बैत=शे’र, हुदी-ख़्वाँ=ऊँट-
सवार, जो यात्रा-गीत गाते हैं)