Faiz Ahmed Faiz – Lahu ka suraag
लहू का सुराग़
कहीं नहीं है, कहीं भी नहीं लहू का सुराग़
न दस्तो-नाख़ुने-कातिल न आसतीं पे निशां
न सुरख़ी-ए-लब-ए-ख़ंजर, न रंगे-नोके-सनां
न ख़ाक पर कोई धब्बा न बाम पर कोई दाग़
कहीं नहीं है, कहीं भी नहीं लहू का सुराग़
न सरफ़े-ख़िदमते-शाहां कि खूंबहा देते
न दीं की नज़र कि बयाना-ए-जज़ा देते
न रज़मगाह में बरसा कि मोतबर होता
किसी अलम पे रकम हो के मुशतहर होता
पुकारता रहा बे-आसरा यतीम लहू
किसी को बहरे-समाअत न वक़्त था न दिमाग़
न मुद्दई, न शहादत, हिसाब पाक हुआ
यह ख़ूने-ख़ाकनशीनां था रिज़के-ख़ाक हुआ
अप्रैल १९६५
(दस्तो-नाख़ुने-कातिल =कातिल के हाथ पर
नाख़ुन, लब-ए-ख़ंजर=खंजर की नोक, सनां=
तलवार, सरफ़े-ख़िदमते-शाहां=राजायों की सेवा
में ख़र्च होने वाला, खूंबहा=लहु का मूल्य, बयाना-
ए-जज़ा=पुण्य-फल का पेशगी भुगतान, रज़मगाह=
रण-भूमि, मुशतहर=चर्चित, बहरे-समाअत=सुनवाई
के लिए, रिज़के-ख़ाक=मिट्टी की ख़ुराक)
नाख़ुन, लब-ए-ख़ंजर=खंजर की नोक, सनां=
तलवार, सरफ़े-ख़िदमते-शाहां=राजायों की सेवा
में ख़र्च होने वाला, खूंबहा=लहु का मूल्य, बयाना-
ए-जज़ा=पुण्य-फल का पेशगी भुगतान, रज़मगाह=
रण-भूमि, मुशतहर=चर्चित, बहरे-समाअत=सुनवाई
के लिए, रिज़के-ख़ाक=मिट्टी की ख़ुराक)