Hindi Poetry

Mirza Ghalib – Woh aa ke khwaab mein


वो आके ख़्वाब में तसकीन-ए-इज़तिराब तो दे
वले मुझे तपिश-ए-दिल मजाल-ए-ख़वाब तो दे

करे है कतल, लगावट में तेरा रो देना
तेरी तरह कोई तेग़े-निगह की आब तो दे

दिखा के जुम्बिश-ए-लब ही तमाम कर हमको
न दे जो बोसा, तो मुंह से कहीं जवाब तो दे

पिला दे ओक से साकी, जो हमसे नफ़रत है
पयाला गर नहीं देता न दे, शराब तो दे

‘असद’ ख़ुशी से मेरे हाथ-पांव फूल गए
कहा जो उसने, ज़रा मेरे पांव दाब तो दे